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द्रौपदी चीरहरण पर कविता | Dropadi Cheer Haran Poem in Hindi

Dropadi Cheer Haran Poem Kavita Poetry in Hindi – इस आर्टिकल में द्रोपदी चीर हरण कविता दी गई है. नारी का अपमान करने का परिणाम हमेशा ही विनाश होता है.

Dropadi Cheer Haran Poem in Hindi

द्रोपदी चीर हरण प्रसंग – यह कविता मुझे बहुत ही हृदय स्पर्शी लगी. इसे श्वेता राय ने लिखा है.

अग्निकुंड से थी वो जन्मी, सुंदरता की मूरत थी।
द्रुपद सुता वो ज्ञान मान में, माँ वाणी की सूरत थी।।
आज भूमि पर गिरी पड़ी वो,आभा से भी हीन हुई।
इंद्रप्रस्थ की थी वो रानी, पर वैभव से दीन हुई।

श्यामल निर्मल देह सुकोमल, धधक रहा अपमान से।
ललना चोटिल थी वो लगती, टूट चुके अभिमान से।।
मुखमण्डल पर क्षोभ घना था, आँखों से बहता निर्झर।
केश राशियाँ काल सर्प सी, बिखर उड़ रहीं थी फरफर।।

बैठे थे धृतराष्ट्र पितामह, द्रोणाचार्य भी साथ में।
शूरवीर सम्मानित सारे, हाथ मले बस हाथ में।।
वो रानी थी रजस्वला जो, घिरी खड़ी दरबार में।
खींच रहा दुःशासन जिनको, पूजित थी संसार में।।

दृग कपाट थे बन्द वहां सब, विदुर छोड़ दरबार गये।
वाणी से कौरव अब अपने, मर्यादा के पार गये।।
कर्ण कहे दुःशासन से अब, पांचाली निर्वस्त्र करो।
हार चुके पांडव चौसर में, अब इससे मन मोद भरो।।

देख रही कृष्णा बन कातर, शूरवीर अपने स्वामी।
बैठे थे लाचार वहां सब, जगत् कहे जिनको नामी।।
शोकाकुल थे मौन वहां सब, लज्जा से गड़ते जाते।
कौन है मेरा कहे द्रोपदी, कब उत्तर वो दे पाते।।

बीच सभा में खड़ी द्रोपदी, मांग रही सत की भिक्षा।
कहती है वो राजसभा से, भूल गए क्या सब शिक्षा।।
एक वस्त्र में आज यहाँ मैं, दल दल में गिरती जाती।
धर्म पुरोधाओं क्या तुमको, लाज तनिक भी है आती।।

मान तुम्हारा ही क्या जग में, क्या मेरा सम्मान नहीं।
दांव लगा बैठे क्यों पांडव, क्या मुझमें अभिमान नहीं।।
बैठे हैं चुप आप पितामह कुल की ज्योति मलीन हुई।
आज लगा मुझको धरती ये, वीर पुरुष से हीन हुई।।

वस्त्र पकड़ कर खड़ी द्रोपदी, पास खड़ा है दुःशासन।
दुर्योधन कहता अब लाओ, जंघा पर दे दो आसन।।
बचा सके अब स्वाभिमान को, नियती से वो उलझ पड़ी।
बलशाली कौरव के आगे, क्षमता भर थी लड़ी खड़ी।।

भूल गई वो राजसभा अब, भूल गई वो मर्यादा।
उमड़ पड़े दृग नद से आँसू, पीर बढ़ गई जब ज्यादा।।
भूल गई वो तन अपना फिर, भूल गई संसार को।
याद रहे बस किशन कन्हाई, थे बचपन के प्यार जो।।

आओ सुनो द्वारिकावासी, बनवारी हे गिरधारी।
प्रेमरूप गोपी बल्लभ अब, जीवन लगता ये भारी।।
झेल रही अपमान यहाँ मैं, शक्तिमान हे मीत सुनो।
हार गये हैं पांडव मुझको, अजब खेल की रीत सुनो।।

गोविंदा हे कृष्ण कन्हाई, आओ बन जीवन दाता।
कहाँ छुपे हो ब्रजनंदन तुम सर्वजगत् के हो ज्ञाता।।
मीत! शरण में आन खड़ी मैं, रक्षा मेरी आज करो।
लाज बचाने को मधुसूदन, आकर मेरी बाँह धरो।।

हे कान्हा आओ की रट सुन कम्पित वसुधा डोल रही।
करुणा कातर आर्द्र स्वरों में, हवा वहां की बोल रही।।
बेसुध हो फिर गिरी द्रोपदी, धर्म पताका थी रोती।
आज एक नारी पुरुषों में, वैभव अपना थी खोती।।

दर्पयुक्त मदमस्त दुःशासन, वस्त्र खींचता जोर से।
कृष्णा की कातर ध्वनियाँ सब, लोप हुईं थी शोर से।।
कोलाहल से भरी सभा वो, कब समझी थी पीर को।
लगा हांफने खींच खींच वो, द्रुपद सुता की चीर को।।

भूधर एक विशाल बन गया, दस गज वस्त्र अपार हुआ।
निर्वस्त्र द्रोपदी को करना, कौरव क्षमता के पार हुआ।।
लिए वास थे कृष्ण कन्हाई, मलिन रजस्वला चीर में।
वस्त्र रूप बन कर वो आये, द्रुपदसुता के पीर में।।

भीषण तम जब घना अँधेरा,तिमिर नाश करने आते।
ज्ञान मान मर्यादा गरिमा, संबल बन सब पर छाते।।
साक्षी बन भगवान कह रहे, मीत सदा अपने होते।
विमुख समय में साथी कोई, कभी कहाँ छोड़े रोते।।

जय बोलो मधुसूदन की सब,जय बोलो गिरधारी की।
जब बोलो सब मीत मिताई,जय बोलो बनवारी की।।
जय उसका जो अजिर साथ है, जय भावों के रानी की।
जय हो राजा अमर प्रेम के, जय हो प्रीत कहानी की।।

श्वेता राय


द्रौपदी चीरहरण पर कविता

द्रौपदी – कुंती” शीर्षक नामक इस कविता में द्रोपदी पूरे सभा से और माँ कुंती से प्रश्न करती है और माँ कुंती अपराध बोध भाव से उत्तर देती है. इसके लेखक रश्मि प्रभा हैं.

कुंती
वाकई तुम माँ’ कहलाने योग्य नहीं थी !!!
अरे जब तुमने समाज के नाम पर
अपने मान के लिए
कर्ण को प्रवाहित कर
दिया
पुत्रो की बिना सुने मुझे विभाजित कर दिया
तो तुम क्या मेरी रक्षा करती ?!
मन्त्रों का प्रयोग करनेवाली तुम
तुम्हें क्या फर्क पड़ता था
अगर तुम्हारे पुत्र मुझे हार गए
और दुःशासन मुझे घसीट लाया
….
दम्भ की गर्जना करता कौरव वंश
और दूसरी तरफ …
स्थिर धर्मराज के आगे स्थिर अर्जुन
भीम,नकुल-सहदेव …
भीष्म प्रतिज्ञा करनेवाले पितामह
परम ज्ञानी विदुर
…. !!!
धृतराष्ट की चर्चा तो व्यर्थ ही है
वह तो सम्पूर्णतः अँधा था
पर जिनके पास आँखें थीं
उन्होंने भी क्या किया ?
पलायन, सिर्फ पलायन ….

आज तक मेरी समझ में नहीं आया
कि सबके सब असमर्थ कैसे थे ?
क्या मेरी इज़्ज़त से अधिक
वचन और प्रतिज्ञा का अर्थ था ?

मैं मानती हूँ
कि मैंने दुर्योधन से गलत मज़ाक किया
अमर्यादित कदम थे मेरे
पर उसकी यह सजा ?!!!

आह !!!
मैं यह प्रलाप तुम्हारे समक्ष कर ही क्यूँ रही हूँ !

कुंती,
तुम्हारा स्वार्थ तो बहुत प्रबल था
अन्यथा –
तुम कर्ण की बजाये
अपने पाँच पुत्रों को कर्ण का परिचय देती
रोक लेती युद्ध से !
तुम ही बताओ
कहाँ ? किस ओर सत्य खड़ा था ?

यदि कर्ण को उसका अधिकार नहीं मिला
तो दुर्योधन को भी उसका अधिकार नहीं मिला
कर्ण ने तुम्हारी भूल का परिणाम पाया
तो दुर्योधन ने
अंधे पिता के पुत्र होने का परिणाम पाया
…. कुंती इसमें मैं कहाँ थी ?
मुझे जीती जागती कुल वधु से
एक वस्तु कैसे बना दिया तुम्हारे पराक्रमी पुत्रों ने ?

निरुत्तर खड़ी हो
निरुत्तर ही खड़ी रहना
तुम अहिल्या नहीं
जिसके लिए कोई राम आएँगे
और उद्धार होगा !
और मैं द्रौपदी
तीनों लोक, दसों दिशाओं को साक्षी मानकर कहती हूँ
कि भले ही महाभारत खत्म हो गया हो
कौरवों का नाश हो गया हो
लेकिन मैंने तुम्हें
तुम्हारे पुत्रों को माफ़ नहीं किया है
ना ही करुँगी
जब भी कोई चीरहरण होगा
कुंती
ये द्रौपदी तुमसे सवाल करेगी

 …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. ….

द्रौपदी,
मैं समझती हूँ तुम्हारा दर्द
पर आवेश में कहे गए कुछ इलज़ाम सही नहीं
मेरी विवशता,
मेरा डर
मेरा अपराध हुआ
पर,
तुम ही कहो
मैं क्या करती ?!
माता से कुमाता होना
मेरी नियति थी
उस उम्र का भय …
मुझे अपाहिज सा कर गया

राजकन्या थी न
पिता की लाज रखते हुए
पाण्डु पत्नी हुई !
दुर्भाग्य कहो
या होनी की सजा
मुझे मंत्र प्रयोग से ही मातृत्व मिला
फिर वैधव्य …
मैं सहज थी ही नहीं द्रौपदी !!
पुत्रों की हर्ष पुकार पर मैंने तुम्हें सौंप दिया
लेकिन !!!
मेरी आज्ञा अकाट्य नहीं थी
मेरे पुत्र मना कर सकते थे
पर उन्होंने स्वीकार किया !
द्रौपदी,
यह उनकी अपनी लालसा थी
ठीक जैसे द्यूत क्रीड़ा उनका लोभ था
भला कोई पत्नी को दाव पर लगाता है !!
मैं स्वयं भी हतप्रभ थी
जिस सभा में घर के सारे बुज़ुर्ग चुप थे
उस सभा में मैं क्या कहती ?
तुम्हारी तरह मैं भी कृष्ण को ही पुकार रही थी
….
मेरी तो हार हर तरह से निश्चित थी
एक तरफ कर्ण था
दूसरी तरफ तथाकथित मेरे पांडव पुत्र !
अँधेरे में मैंने कर्ण को मनाना चाहा
युद्ध को रोकना चाहा
लेकिन मान-अपमान के कुरुक्षेत्र में
मैं कुंती
कुछ नहीं थी !
फिर भी,
मैं कारण हूँ
तुम मुझे क्षमा मत करो
पर मानो
मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया !!!
– रश्मि प्रभा


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